निरक्षरता : एक अभिशाप


शिक्षा के बिना मनुष्य पशु के समान है। शिक्षा हमारे अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करती है और ज्ञान के प्रकाश को फैलाती है। भारत एक विशाल देश है। हमने लम्बे समय तक परतन्त्रता की पीड़ा को सहा है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद जनता ने शिक्षा के महत्व को समझा और निरक्षरता को दूर करने के लिए साक्षरता आंदोलन प्रारम्भ किया गया। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद लोगों ने निरक्षरता के विरुद्ध एक बहुत बड़ा अभियान चलाया। इस समय देश के असंख्य अनपढ़ नर-नारियों को साक्षर बनाने के प्रयास शुरू किए गए। गाँवों में अशिक्षितों को शिक्षित करने के साथ-साथ उनके मनोरंजन, स्वास्थ्य और ज्ञान वृद्धि की ओर भी ध्यान दिया जाने लगा। गाँव के लोगों के पारिवारिक तथा आर्थिक जीवन को उन्नत बनाने का भी प्रयास किया जाने लगा।

देश के प्रौढ़ों को शिक्षित करने के लिए प्रौढ़ शिक्षा आंदोलन की शुरुआत की गई। प्रौढ़ शिक्षा से हमारा अभिप्राय ऐसे निरक्षरों को साक्षर बनाना था जो किसी कारणवश अपने बचपन में पढ़ाई से वंचित रहकर रोजगारों में लग गए। ऐसे प्रौढ़ व्यक्तियों को साक्षर बनाना ही प्रौढ़ शिक्षा थी। दिन भर अपने कामों में व्यस्त रहने के कारण प्रौढ़ व्यक्ति स्कूल नहीं जा सकते थे। अतः इन व्यक्तियों की पढ़ाई के लिए उनके घर के आसपास ही शाम के समय पढ़ाई की व्यवस्था की जाती थी।

हमारे देश में तीन चौथाई से अधिक लोग अशिक्षित हैं। अतः अशिक्षित जनता के बीच लोकतंत्र का निर्वाह हो पाना अत्यन्त कठिन हो जाता है। अशिक्षित होने के कारण न तो ये लोग अपने मत का महत्त्व समझते हैं। और न ही अपना ठीक प्रतिनिधि चुन पाते हैं। प्रौढ़ शिक्षा की एक व्यापक योजना की शुरूआत 2 अक्तूबर 1978 को शुरू की गई थी। इस योजना पर सरकार ने 200 करोड़ रुपए खर्च करने का निर्णय लिया था। इस योजना में प्रौढ़ों की अक्षर ज्ञान देने के साथ-साथ व्यावसायिक ज्ञान प्रदान करने की भी व्यवस्था की गई थी। सम्पूर्ण देश में जगह- जगह पर प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र खोले गए थे।

केंद्र सरकार और राज्य सरकार इस योजना के प्रति काफी चिंतित थी। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत आज भी एक अशिक्षित एवं पिछड़ा हुआ देश माना जाता है। यह भारत का दुर्भाग्य है कि वह संसार का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश होकर भी पिछड़ा हुआ और अशिक्षित है। इस योजना के समक्ष अनेक समस्याएँ थी। प्रौढ़ शिक्षा की योजना के अन्तर्गत आने वाले अधिकांश व्यक्ति खेती-बाड़ी, मजदूरी और हाथ के काम-धंधों से जुड़े हुए थे। इसलिए ऐसे लोग शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रौढ़ शिक्षा केंद्रों में बहुत कम आ पाते थे। देश में शिक्षित बेरोजगारों की बहुत बड़ी संख्या है। बाद में साक्षरता अभियान चलाया गया। बहुत से लोगों को रोजगार देकर साक्षरता अभियान में लगाया गया जिससे वह योजना काफी हद तक सफल हुई। आजकल निरक्षरता को समाप्त करने के लिए सर्व शिक्षा अभियान चलाया गया है।

सर्व शिक्षा अभियान को साधारण जनता तक पहुँचाना अत्यन्त आवश्यक है। इसके लिए हमें जन-जन में चेतना जाग्रत करनी होगी। देश के बड़े-बड़े उद्योगों में भी अशिक्षित व्यक्तियों को शिक्षित बनाने की व्यवस्था की जानी चाहिए। इस अभियान पर हमारे देश का भविष्य निर्भर करता है, क्योंकि जब तक हमारे देश की जनता शिक्षित नहीं होगी, वह इसी प्रकार शोषण का शिकार होती रहेगी। शिक्षा उन लोगों को नई दिशा प्रदान कर सकती है जो लोग अपनी कृषि और मजदूरी का हिसाब-किताब नहीं रख सकते।

आज पूरे देश में सर्व शिक्षा अभियान पूरे जोर-शोर से चल रहा है, ताकि कोई बच्चा अशिक्षित न रहे। सर्व शिक्षा अभियान के सकारात्मक परिणाम हमारे सामने आ रहे हैं। इस अभियान को केवल सरकार के सहारे ही नहीं चलाया जा सकता क्योंकि सभी बच्चों को पढ़ने के लिए राजी करना आसान काम नहीं है। इस कार्य के लिए सभी पढ़े-लिखे लोगों को आगे आना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति का लक्ष्य होना चाहिए- 'ईच वन टीच वन'। तभी हम इस निरक्षता रूपी कलंक को अपने समाज से मिटा सकते हैं।